Hindi
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सूत्र की व्याख्या- संज्ञा- परिभाषा- विधि- नियम अतिदेश और अधिकार छः प्रकार के पाणिनीय सूत्रों में यह अधिकार सूत्र है। | सूत्रव्याख्या- संज्ञा- परिभाषा- विधि- नियमातिदेशाधिकारात्मकेषु षड्विधेषु पाणिनीयसूत्रेषु इदम् अधिकारसूत्रम्। |
सरलार्थ - यह रुद्राध्याय का तेरहवाँ मन्त्र है। | सरलार्थः - अयं रुद्राध्यायस्य त्रयोदशो मन्त्रः। |
और अन् अन्त से अव्ययीभाव से पर समासान्त तद्धित संज्ञक टच् प्रत्यय होता है यही सूत्रार्थ है। | एवम् "अन्नन्ताद् अव्ययीभावात् परः समासान्तः तद्धितसंज्ञकः टच्प्रत्ययः भवति" इति सूत्रार्थः। |
उससे पूजनार्थ से परे जो प्रातिपदिकान्तात् समासात् पद प्राप्त होता है। | तेन पूजनार्थात्परं यत्प्रातिपदिकम् तस्माद् इति लभ्यते। |
छठे दिन - ज्योतिष्टोम। | षष्ठदिवसः- ज्योतिष्टोमः। |
अतः दूसरे दिवे-शब्द का इस सूत्र से अनुदात्त स्वर होता है। | अतः द्वितीयस्य दिवे-शब्दस्य अनेन सूत्रेण अनुदात्तस्वरो भवतीति शम्। |
आदित्य रूप में अत्यधिक तेज से चमकता है और जिसको देवों के पुरोहित सभी कार्यों में आगे रखते है (यः देवानां पुरः अग्रे इन्द्रत्वेन स्थितः। | अतिशयेन तेजसा तपति आदित्यरूपेण। यश्च देवानां पुरोहितः सर्वकार्येषु अग्रे नीतः।(यः देवानां पुरः अग्रे इन्द्रत्वेन स्थितः। |
तब वह सम्प्रदायविद होता है। | तदा स सम्प्रदायविद् भवेद्। |
अर्थात् उपनिषदों से तात्पर्य है उस विषय में संशय ही प्रमाणगत असम्भावना के रूप में होता है। | अर्थात् उपनिषदां कुत्र तात्पर्यमिति विषये संशयः एव प्रमाणगता असम्भावना। |
परन्तु प्रकृत सूत्र में अनावः कहने से नाव्यानाम इसके आदि अच् नकार से उत्तर आकार को प्रकृत सूत्र से उदात्त स्वर नहीं होता है। | परन्तु प्रकृतसूत्रे अनावः इत्युक्तत्वात् नाव्यानामित्यस्य आदेः अचः नकारोत्तरस्य आकारस्य प्रकृतसूत्रेण न उदात्तस्वरः। |
और उससे स्त्रीत्व विवक्षा में ष्यङन्त कारीषगन्ध्य प्रातिपदिक से यङश्चाप् सूत्र से चाप् प्रत्यय होने पर कारीषगन्ध्य चाप् स्थिति होती है। | तेन च स्त्रीत्वविवक्षायां ष्यङन्तात् कारीषगन्ध्य इति प्रातिपदिकात् यङश्चाप् इति सूत्रेण चाप् प्रत्यये सति कारीषगन्ध्य चाप् इति स्थितिः भवति। |
वृत्ति नाम किसका है? | वृत्तिर्नाम का ? |
प्रमाणभूत सूत्र है-''संख्या पूर्वोद्विगुः इति। 41. प्रादि समास के विधायक पाँच वार्तिकों का यहाँ उल्लेख किया गया है “'प्रादयोगताद्यर्थे प्रथमया '', “ अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया”, “ अवादयः क्रुष्टाद्यर्थे तृतीयया'', “ पर्यादयो ग्लानाद्यर्थे चतुर्थ्या” “निरादयः क्रात्ताद्यर्थे पञ्चम्या। 42. “तत्पुरुषस्याङ्कुलेः संख्याव्ययादेः' और “अहः सर्वेकदेशसंख्यातपुण्याच्च रात्रेः” ये दो सूत्र उल्लेखित हैं। | प्रमाणभूतं सूत्रं हि संख्यापूर्वो द्विगुः इति। ४१. प्रादिसमासस्य विधायकानि पञ्च वार्तिकान्यपि समुल्लिखितानि - "प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमया", "अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया", "अवादयः क्रुष्टाद्यर्थ तृतीयया", "पर्यादयो ग्लानाद्यर्थ चतुर्थ्या", "निरादयः क्रान्ताद्यर्थे पञ्चम्या" इति। ४२. "तत्पुरुषस्याङ्कुलेः संख्याव्ययादेः" इति "अहःसर्वैकदेशसंख्यातपुण्याच्च रात्रेः" इति सूत्रद्वयम् उल्लिखितम्। |
उपासते - उपपूर्वक आस्- धातु से लट्-लकार प्रथमपुरुष बहुवचनान्त का यह रूप है। | उपासते- उपपूर्वकात् आस्- धातोः लट्-लकारस्य प्रथमपुरुषस्य बहुवचनान्तं रूपम् इदम्। |
यह महाव्रत ऐतरेय ब्राह्मण के तीसरे प्रपाठक के गवामयन का ही एक अंश है। | महाव्रतमिदम् ऐतरेयब्राह्मणस्य प्रपाठकत्रयस्य गवामयनस्य एव एकांशोऽस्ति। |
एवं वा, ह, अह, एव, एवम्, नूनम्, शाश्वत्, युगपत्, भूयस् - इत्यादि में भी इस सूत्र के उदाहरण जानने चाहिए। | एवं वा, ह, अह, एव, एवम्, नूनम्, शश्वत्, युगपत्, भूयस् इत्यादिषु अपि सूत्रस्यास्य उदाहरणं बोध्यम्। |
अपने पदों का बिना प्रयोग कर किया गया विग्रह अस्वपद विग्रह कहलाता है। | स्वस्य पदानि प्रयुज्य विग्रहः कृतः नास्ति स अस्वपदविग्रहः इति यावत्। |
अब कहते हैं की भले ही इस उपनिषद् में आकाश की उत्पत्ति दिखाई गई है लेकिन यह तत् 'तत्तेजोऽसृजत' इस श्रुति वाक्य के तो विपरीत है। | ननु सत्यं दर्शितम्, परन्तु विरुद्धं तत् "तत्तेजोऽसृजत" इत्यनेन श्रुत्यन्तरेण; इति । |
अत: दिक्शब्द यहाँ पूर्वपद है। | अतः दिक्शब्दः अत्र पूर्वपदम्। |
( वा. ६५२) वार्तिक का अर्थ - षष्ठ्यन्त का भी अन्त उदात्त होता है। | वार्तिकार्थः - षष्ठ्यन्तस्यापि अन्त उदात्तः स्यात्। |
जो जुआरी को उधार धन देता है, वह इस संदेह में रहता है की मेरा धन फिर मिलेगा अथवा नही मिलेगा। | ऋणावा अक्षपराजयादृणवान् कितवः सर्वतो बिभ्यद्धनं स्तेयजनितम् इच्छमानः कामयमानः अन्येषां ब्राह्मणादीनाम् अस्तं गृहम् । |
नि अर्थात् निश्चय रूप से जो विद्या ब्रह्म की जीवात्मा को प्राप्ति करवाती है वह ब्रह्मविद्या इसलिए शङ्कराचार्य ने कठोपनिषद् के भाष्य में कहा की “पूर्वोक्तविशेषणान्मुमुक्षून् वा परं ब्रह्म गमयति इति ब्रह्मगमयितृत्वेन योगात् ब्रह्मविद्या उपनिषत्” इति। | नि अर्थात् निश्चयरूपेण ब्रह्मणि एव जीवात्मानं प्रापयति या विद्या सा ब्रह्मविद्या अतः एव शङ्कराचार्येण कठोपनिषदः भूमिकाभाष्ये उच्यते “पूर्वोक्तविशेषणान्मुमुक्षून् वा परं ब्रह्म गमयति इति ब्रह्मगमयितृत्वेन योगात् ब्रह्मविद्या उपनिषत्” इति। |
इस पाठ के अध्ययन से आप समर्थ होंगे,अनुबन्धों को समास विधि से जानने में; अनुबन्धों के ज्ञान को आवश्यकता को जानने में; कर्म के रहस्यों का ज्ञान प्राप्त करने में; कर्म का रहस्य जानने में समर्थ होंगे; साधना का कारण जानने में; अधिकारी तथा उसके द्वारा प्राप्तव्य सम्पत्ति के बारे में जानने में; सम्पत्ति के अर्जन के लिए क्या साधन क्रम से करना चाहिए यह विवेक जाग्रत हो जाता हैं । | पाठस्यास्याध्ययनेन अनुबन्धान् समासेन अवगच्छेत्। अनुबन्धानां ज्ञानस्य आवश्यकतां बुध्यात्। कर्मरहस्यं जानीयात्।साधनायाः कारणम् अवधारयेत्।अधिकारिणः सम्पादनीया सम्पत्तिः स्पष्टा भवेत्।सम्पत्तेर्जनाय किं साधनं केन क्रमेण कर्तव्यमिति विवेको जायेत। |
प्रजानामिति प्र-जानाम्। | प्रजानामिति प्र - जानाम्। |
जो सब उत्पन्न है या जो सब उत्पन्न होने वाला है वो सब पुरुष ही हैं। | यत् सर्वम् उत्पन्नं, यद् वा सर्वम् उत्पत्तिमेष्यति तत् सर्वं पुरुष एव। |
शब्द भी नहीं होता है। | शब्दश्च नास्ति। |
इस कारण से जन्तु जन्म जन्मांतरों को प्राप्त करता है। | एतेन कारणेन जन्मनः जन्मान्तरं लभते जन्तुः। |
वरुण और अग्नि इसके इष्ट देवता हैं। | वरुणः अग्निः च अस्याः इष्टेः देवते। |
जैसे- छान्दोग्योपनिषद् के छठे अध्याय में कहा गया है “आचार्यवान् पुरुषो वेद, तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्ये अथ सम्पत्स्ये” (6/14/2) इति। | यथा- छान्दोग्योपनिषदः षष्ठाध्याये आम्नायते “आचार्यवान् पुरुषो वेद, तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्ये अथ सम्पत्स्ये” (६/१४/२) इति। |
तव्यति कृते कृत् उत्तर पद प्रकृति स्वर से प्रकृति स्वर, तव्यत् में तो फलभेद नहीं होता है। | तव्यति कृते कृदुत्तरपदप्रकृतिस्वरेण प्रकृतिस्वरः, तव्ये तु नेति फलभेदः। |
पाठ्य विषय का उद्देश्य ( पाठ्य विषय के बिंदु ) उच्चतर माध्यमिक कक्षा हेतु भारतीय दर्शन की पुस्तक में निम्न विषय सम्मिलित हैं। | पाठ्यविषयस्य उद्देशः (पाठ्यविषयबिन्दवः) उच्चतरमाध्यमिककक्षाया भारतीयदर्शनस्य पुस्तके निम्नविषयाः अन्तर्भवन्ति। |
पुरुषसूक्त का ऋषि, छन्द और देवता कौन है? | पुरुषसूक्तस्य कः ऋषिः, किं छन्दः, का च देवता। |
पतञ्जलि के कथन अनुसार कठ संहिता का प्रचार तथा पठन-पाठन प्रत्येक गाँव में था (ग्रामे ग्रामे काठक कालापक च प्रोच्यते'- महाभाष्य में ४/३/१०१)। | पतञ्जलेः कथानुसारं कठसंहितायाः प्रसारः तथा पठन-पाठनं प्रतिग्रामम् आसीत् ('ग्रामे ग्रामे काठकं कालापकं च प्रोच्यते”- महाभाष्यम् ४/३/१०१)। |
इस प्रकार से अद्वैत की हानि होने पर वह नहीं होता है। | अतः अद्वैतहानिः खलु इति चेदुच्यते तन्न भवति। |
इस प्रकार से चित्प्रतिबिम्बभूत जीव के ह्वारा ही कुछ समझा जा सकता है। | अत एव चित्प्रतिबिम्बभूतेन जीवेन किञ्चिदिव अवगन्तुं शक्यते। |
यहाँ उनमें आदि यजुर्वेद संहिता का सामान्य से परिचय करके माध्यन्दिन संहिता, काण्व संहिता, तैत्तिरीय संहिता, मैत्रायणी संहिता, कठ संहिता, और कापिष्ठल संहिता इत्यादि इनके विभागों की विस्तार से आलोचना करेगें। | अत्र तावत् आदौ यजुर्वेदसंहितायाः सामान्येन परिचयं कृत्वा माध्यन्दिनसंहिता, काण्वसंहिता, तैत्तिरीयसंहिता, मैत्रायणीसंहिता, कठसंहिता, कापिष्ठलसंहिता च इत्येतेषां विभागानां विस्तरशः आलोचना करिष्यते। |
उसके विधायक अनेक सूत्र हैं। | तस्य विधायकानि अनेकानि सूत्राणि सन्ति। |
व्याख्या - रथी जिस प्रकार से कशाघात द्वारा घोड़ों को उत्तेजित करके योद्धाओं का अविष्कृत करता है उसी प्रकार पर्जन्य भी मेघो को प्रेरित करके वारिवर्षक मेघों को प्रकट करते हैं। | व्याख्या- रथीव रथस्वामीव। स यथा कशया अश्वान् अभिक्षिपन् दूतान् भटान् आविष्करोति तद्वदसौ पर्जन्योऽपि कशया अश्वान् मेघान् अभिक्षिपन् अभिप्रेरयन् वर्ष्यान् वर्षकान् दूतान् दूतवत् वृष्टिप्रेरकान् मेघान् मरुतो वा आविः कृणुते प्रकटयति । |
वस्तुतः हम सुख को ही चाहते हैं। | वस्तुतः सुखमेव ना वाञ्छति। |
अज्ञान से अस्पृष्ट होता हे। | अज्ञानेन अस्पृष्टमस्ति। |
सभी कर्म अनित्य के ही साधन होते है। | सर्वं तु कर्म अनित्यस्यैव साधनम् अस्ति। |
इसिलए दुःख के कारणों से बहुत से लोग प्रमाद करते हैं। | अतः दुःखकारणात् प्रमादं कुर्वन्ति बहवः। |
वहाँ उच्चौस्तराम् इति और वा इति ये दो अव्ययपद हैं, वषट्कारः यह प्रथमा एकवचनान्त पद है। | तत्र उच्चैस्तराम् इति वा इति च द्वे अव्ययपदे, वषट्कारः इति प्रथमैकवचनान्तं पदम्। |
अस्तवे “असु क्षेपणे' तुमर्थे तवेप्रत्ययः। | अस्तवे 'असु क्षेपणे' तुमर्थे तवेप्रत्ययः। |
वेद भी जीवन कलायुक्त हो, ऐसा भाव प्रकट करता है। | वेदः अपि जीवनं कलायुक्तं भवेत् इति सम्भावयति। |
और यह पद बहुवचनान्त भी है। | इदं च पदं बहुवचनान्तम् अपि वर्तते। |
उनको किए बिना संन्यास फलवान नहीं होता है। | तानि न कृतानि चेत् संन्यासः फलवान् न भवति। |
7 सत्य किसे कहते हैं? | ७. किं नाम सत्यम्? |
24. “' धातुप्रातिपदिकयोः'' यहाँ पर कौन सी विभक्ति और कौन समास है? | २४. धातुप्रातिपदिकयोः इत्यत्र का विभक्तिः कश्च समासः? |
उससे यह आरण्यक यास्क से पूर्ववर्ति माना जाता है। | तेन आरण्यकमिदं यास्कपूर्ववर्ति इति मन्यन्ते नैके। |
उसको मोक्ष लाभ प्राप्त होता है अथवा नहीं इस ज्ञान के लिए यह विषय प्रस्तुत किया जा रहा है। | तस्यैव मोक्षलाभाय सन्नद्धता अस्ति न वेति ज्ञानाय विषयः प्रस्तूयते। |
4 गुरु के महात्म्य का वर्णन कीजिए। | 4 गुरोः माहात्म्यं वर्णयत। |
इस प्रकार से अनेक विषय मुमुक्षु की जिज्ञासा करने वालों के होते है। | इत्यादयो नैके विषया मुमुक्षोः जिज्ञास्याः सन्ति। |
यह कथन भी कुछ आश्चर्यजनक प्रतीत होता है। | इदमपि कथनम् किञ्चित् आश्चर्यजनकम् इति प्रतीयते। |
किस प्रकार का यश? | कीदृशं यशः। |
उदाहरण- इस सूत्र का उदाहरण है - तुर्भ्य हिन्वानः इति। | उदाहरणम्- अस्य सूत्रस्य उदाहरणं भवति तुभ्यं हिन्वानः इति। |
क्या चारों वेदों में अथर्ववेद बहुत विशिष्ट फल देता है। | किम्बहुना वेदेषु अथर्ववेदो बहुलविशिष्टतां निदधाति। |
ब्रह्म ही केवल नित्य वस्तु है, उससे भिन्न अखिल आकाशादिप्रपज्च अनित्य है इस प्रकार का विचार पूर्वक ज्ञान। | ब्रह्म एव नित्यं वस्तु ततः अन्यत् अखिलं सर्वम् आकाशादिप्रपञ्चः अनित्यं वस्तु इति विचारपूर्वकं ज्ञानम्। |
सूत्र व्याख्या :- पाणिनीप्रणीत छ: विधि सूत्रों में यह विधि सूत्र है। | सूत्रव्याख्या - पाणिनिप्रणीतेषु षड्विधेषु सूत्रेषु इदं विधिसूत्रम्। |
7 अपवाद किसे कहते हैं? | ७. अपवादः नाम किम्? |
अदादि गण के अन्तर्गत एक गण है। | अदादिगणान्तर्गतः एकः गणः। |
7 अरोक्ष स्वभाव वाल ब्रह्म होता है यहाँ पर क्या श्रुति है? | ७. अरोक्षस्वभावं ब्रह्म इत्यत्र का श्रुतिः? |
वायु जैसे आती है वैसे ही जाती है। | वायुः यथा आगच्छति निर्गच्छति च। |
इसलिए वहाँ पर “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" इसमें ज्ञान शब्द का प्रकाश अर्थ है। | यत्र तु "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" इति ज्ञानशब्दः तस्य प्रकाशः अर्थः। |
वैदिक ऋषि कवियों में श्रेष्ठ कवि हैं। | वैदिकः ऋषिः कविषु श्रेष्ठः कविः अस्ति। |
7 ब्रह्म स्वयं प्रकाश रूप होता है। | 7 ब्रह्म स्वयं प्रकाशस्वरूपं भवति। |
प्रारब्धकर्म में विद्यमान होने पर मुक्त भी जीव भी शरीर नाश पर्यन्त शरीर में निर्लिप्ता के द्वारा विद्यमान होता है। | प्रारब्धकर्मणि विद्यमाने सति मुक्तोऽपि जीवः शरीरनाशपर्यन्तं शरीरे निर्लिप्ततया विद्यमानस्तिष्ठति । |
आहो इस अव्यय से युक्त है। | आहो इत्यव्ययेन युक्तम् अस्ति। |
जिससे पद्यों के पढ्ने में सुस्वर का और लय का आविर्भाव अत्यधिक रुचिकर होता है। | येन पद्यानां पठने सुस्वरस्य लयस्य च आविर्भावः अतीव रुचिरतया सम्पद्यते। |
विवेकानन्द के द्वारा प्रचारित दर्शन का नाम वेदान्त दर्शन किस लिए हुआ। | विवेकानन्देन प्रचारितस्य दर्शनस्य नाम किमर्थं वेदान्तदर्शनम् इति? |
इस प्रकार से बहुत जन्मों में वह शुद्ध होकर के मुक्तिरूप परमगति को प्राप्त करता है। | एवं बहुषु जन्मसु क्रमेण शुद्धो भूत्वा मुक्तिरूपां परमां गतिं प्राप्नोति इति । |
किन्तु मित्र वाच्य अर्थ तो बालिका हो सकती है और बालक भी हो सकता है। | किन्तु मित्रवाच्यः अर्थः तु बालिका अपि भवितुमर्हति, बालकः अपि भवितुमर्हति। |
86. “ झयः'' इस सूत्र का क्या उदाहरण है? | ८६. "झयः" इत्यस्य सूत्रस्य किम् उदाहरणम्? |
मैं स्वयं आत्मा हूँ इसका ज्ञान होता है। | अहं स्वम् आत्मा इति ज्ञानम्। |
उदात्ताद् अनुदात्तस्य स्वरितः ये सूत्र आये हुए पदच्छेद हैं। | उदात्ताद् अनुदात्तस्य स्वरितः इति सूत्रगतपदच्छेदः। |
2. वेदान्त में अधिकारी का वैराग्य क्या होता हे? | २. वेदान्ते अधिकारिणो वैराग्यं किम्। |
7. प्र अमिनाः इसका क्या अर्थ है? | ७. प्र अमिनाः इत्यस्य कः अर्थः? |
प्रकृति विकृति का भाव का ग्रहण। | प्रकृतिविकृतिभावस्य ग्रहणम्। |
ब्राह्मण प्रतिदिन अग्निहोत्र करे “ब्राह्मणोऽहरहः अग्निहोत्रं जुहुयात्” यह श्रुति प्रमाण है। | ब्राह्मणः प्रत्यहम् अग्निहोत्रं कुर्यात् तत्र "ब्राह्मणोऽहरहः अग्निहोत्रं जुहुयात्" इति श्रुतिः प्रमाणम्। |
® इसलिए इसमें तद्बुद्धि अध्यारोप होता है। | अतस्मिन् तद्बुद्धिः अध्यारोपः। |
प्रकृतियाग प्रधानयाग कहलाते हें। | प्रकृतियागः प्रधानयागः इत्युच्यते। |
4 अहिंसा का प्रतिपादन करने वाला श्रुतिवाक्य क्या है? | ४. अहिंसाया उपोद्गलकं श्रुतिवाक्यं किम्? |
उनमें कुछ विशिष्ट आरण्यक हैं जैसे ऐतरेय आरण्यक, बृहदारण्यक, शांख्यायन आरण्यक और तैत्तरीय आरण्यक यहाँ प्रस्तुत है। | तेषु कानिचित् विशिष्टानि आरण्यकानि यथा ऐतरेयारण्यकं, बृहदारण्यकं , शांख्यायनारण्यकं तैत्तिरीयारण्यकं चेति अत्र प्रस्तूयन्ते। |
केवल नारी नहीं अपितु नर और नारी दोनों ही वहाँ पर अपेक्षित है। | न केवला नारी प्रत्युत नरनायौं उभौ अपि तत्र अपेक्षितौ। |
जघ्नुषः यह रूप कैसे बना? | जघ्नुषः इति रूपं कथं सिद्ध्येत्। |
अथवा, इस भूलोक के शिर के ऊपर पिता द्यौलोक है। | यद्वा, अस्य भूलोकस्य मूर्धन् मूर्धन्युपर्यहं पितरमाकाशं सुवे। |
इसलिए ग्रन्थ के आदि में अनुबन्धों को उपस्थापित किया जाता है। | अतो ग्रन्थादौ एते अनुबन्धाः उपन्यस्यन्ते। |
इसके बाद कृदन्त होने से कृन्तद्धित समासाश्च सूत्र से प्रातिपदिक संज्ञा में कारक के अदन्त प्रातिपदिकत्व से अजाद्यतष्टाप् सूत्र से टाप् प्रत्यय होने पर टाप् के टकार का चुटू सूत्र से इत्संज्ञा होने पर, पकार की हलन्त्यम् सूत्र से इत्संज्ञा होने पर, तस्यलोपः सूत्र से दोनों इत्संज्ञको का लोप होने पर कारक आ स्थिति होती है। | ततः कृदन्तत्वात् कृत्तद्धितसमासाश्च इति सूत्रेण प्रातिपदिकसंज्ञायां जातायाम्, कारक इत्यस्य अदसन्तप्रातिपदिकत्वात् अजाद्यतष्टाप् इति सूत्रेण टाप्- प्रत्यये टापः टकारस्य चुटू इति सूत्रेण इत्संज्ञायाम्, पकारस्य हलन्त्यम् इति सूत्रेण इत्संज्ञायाम्, तस्य लोपः इति सूत्रेण उभयोः लोपे सति कारक आ इति स्थितिः भवति। |
परिमाण में छोटी होने पर भी सारभूत होने से इसके अनुशीलन से संस्कृत भाषा में उपयोगी विषय का सुन्दर ज्ञान प्राप्त कर सकते है। | परिमाणे न्यूनत्वेन अपि सारभूतत्वाद् अस्य अनुशीलनेन संस्कृतभाषायाम् उपयोगिनः विषयस्य सुष्टु ज्ञानं प्राप्तुं शक्यते। |
और वह प्रत्येक दिन वृद्धि को प्राप्त हो। | तच्च प्रतिदिनं वर्धमानम्। |
शचीपति कौन है? | कः शचीपतिः? |
इसी प्रकार उसकी दुरवस्था होता है। | एवं तस्य दुरवस्था भवति । |
श्रौतसूत्र किस शाखा में होते हैं? | श्रौतसूत्र कस्यां शाखायाम् अन्तर्भवति? |
निरीक्षण करें कौ प्रश्न पत्र की क्रम संख्या प्रश्नों की संख्या, प्रथम पृष्ठ के प्रारम्भ में दी हुई संख्या के समान है या नहीं। | निरीक्ष्यताम् यत् प्रश्नपत्रस्य पुटसंख्या प्रश्नानां च संख्या प्रथमपुटस्य प्रारम्भे प्रदत्तसंख्या समाना न वा। |
आज्ञाचक्र दोनों भौहों के बीच में होता है। | आज्ञा भ्रूद्वयमध्ये। |
तीसरे दिन यज्ञस्थल की पूर्व दिशा में प्राग्वंश-नामक महा वेदी का निर्माण होता है। | तृतीयदिवसे यज्ञस्थलस्य पूर्वदिशि प्राग्वंशनामिका महावेदी निर्मीयते। |
वहाँ पर भी सत्त्वरजतमोगुणमय अज्ञान से तथा सत्वगुण के प्राधान्य अन्तः करण उत्पन्न होता है। | तत्रापि सत्त्वरजस्तमोगुणमयाद् अज्ञानाद् सत्त्वगुणस्य प्राधान्येन उत्पन्नमन्तःकरणम्। |
इस याग में सोम लता का रस ही प्रधान आहुति द्रव्य है। | अस्मिन् यागे सोमलतायाः रस एव प्रधानम् आहुतिद्रव्यम्। |
पपाद यहाँ पर किस अर्थ में लिट् है? | पपाद इत्यत्र कस्मिन्नर्थे लिट् ? |
उदात्त का लोप उदात्तलोप यहाँ षष्ठीतत्पुरुष समास है। | उदात्तस्य लोपः उदात्तलोपः इति षष्ठीतत्पुरुषसमासः। |
Subsets and Splits